❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️💞🌹💞🌹💞🌹💞🌹💞🌹💞🌹💞क्या करूँ अर्पण आपको…मेरे श्याम……गई थी पुष्प लेने…जैसे ही छुआ……एक सिहरन सी हुई…क्यों तोड़ने लगी हूँ……ये तो आपकी ही कृति है…आपकी ही महक इसमें…मेरे सरकार……आपकी वस्तु आपको कैसे दूँ…फिर सोचती हूँ…क्या अर्पण करूँ…मेरे घनश्याम……ये मन…ये तो सबसे मलिन है……अवगुणों से भरा हुआ…जिसमे कुछ रिक्त नहीं…छल कपट भरे पड़े…प्रेम कहाँ रखूँगी आपका नहीं नहीं……ये कपटी मन योग्य नहीं…आपको अर्पण करने को……तो क्या अर्पण करूँ…मेरे गोविन्द…अश्रु धारा निकल पड़ी…ये अश्रु भी धोखा हैं……प्रेम के नहीं…ये तो अपने सुख के अभाव में निकले……आपकी याद में आते तो…यही अर्पण कर देती……पर नहीं…ये भी झूठे है……क्या अर्पण करूँ…सब मलिन हैक्या अर्पण करूँ…मेरे साँवरे……मेरी आत्मा…???…ये तो नित्य आपकी दासी है…ये तो आपसे ही आई है…आपकी ही हेजय हो मेरे राधारमण की 🙏🙏🌹🙏🙏 #मधुस्नेहा,,।।🌹✍️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️🌼🌼ठाकुर जी को ताता खानी🌼🌼 ब्रजरानी यशोदा भोजन कराते-कराते थोड़ी सी छुंकि हुई मिर्च लेकर आ गई क्योंकि नन्द बाबा को बड़ी प्रिय थी। लाकर थाली एक और रख दई तो अब भगवान बोले की बाबा हमे और कछु नहीं खानो , ये खवाओ ये कहा है ? हम ये खाएंगे तो नन्द बाबा डराने लगे की नाय-नाय लाला ये तो ताता है। तेरो मुँह जल जाओगो तो भगवान बोले नाय बाबा अब तो ये ही खानो है मोय खूब ब्रजरानी यशोदा को बाबा ने डाँटो की मेहर तुम ये क्यों लेकर आई ? तुमको मालूम है ये बड़ो जिद्दी है , ये मानवो वारो नाय फिर भी तुम लेकर आ गई।अब गलती हो गई ठाकुर जी मचल गए बोले अब बाकी भोजन पीछे होगा पहले ये ताता ही खानी है मुझे , पहले ये खवाओ । बाबा पकड़ रहे थे , रोक रहे थे पर इतने में तो उछलकर थाली के निकट पहुंचे और अपने हाथ से उठाकर मिर्च खा ली और अब ताता ही हो गई वास्तव में , ताता भी नहीं ” ता था थई ” हो गई। अब महाराज भागे डोले फिरे सारे नन्द भवन में बाबा मेरो मो जर गयो , बाबा मेरो मो जर गयो , मो में आग लग गई मेरे तो बाबा कछु करो और पीछे-पीछे ब्रजरानी यशोदा , नन्द बाबा भाग रहे है हाय-हाय हमारे लाला को मिर्च लग गई , हमारे कन्हिया को मिर्च लग गई। महाराज पकड़ा है प्रभु को और इस लीला को आप पढ़ो मत बल्कि देखो ।गोदी में लेकर नन्द बाबा रो रहे है अरी यशोदा चीनी लेकर आ मेरे लाला के मुख ते लगा और इतना ही नहीं बालकृष्ण के मुख में नन्द बाबा फूँक मार रहे है। आप सोचो क्या ये सोभाग्य किसी को मिलेगा ? जैसे बच्चे को कुछ लग जाती है तो हम फूँक मारते है बेटा ठीक हे जाएगी वैसे ही बाल कृष्ण के मुख में बाबा नन्द फूँक मार रहे है। देवता जब ऊपर से ये दृश्य देखते है तो देवता रो पड़ते है और कहते है की प्यारे ऐसा सुख तो कभी स्वपन में भी हमको नहीं मिला जो इन ब्रजवासियो को मिल रहा है तो आगे यदि जन्म देना तो इन ब्रजवासियो के घर का नोकर बना देना , यदि इनकी सेवा भी हमको मिल गई तो देवता कहते है हम धन्य हो जाएंगे।🥀🥀 जय श्री नंदलाल 🥀🥀❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️. श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली पोस्ट - 054 द्विविध-भाव भगवद्भावेन यः शश्वद्भक्तभावेन चैव तत्। भक्तानानन्दयते नित्यं तं चैतन्यं नमाम्यहम्॥ प्रत्येक प्राणी की भावना विभिन्न प्रकार की होती है। अरण्य में खिले हुए जिस मालती के पुष्प को देखकर सहृदय कवि आनन्द में विभोर होकर उछलने और नृत्य करने लगता है, जिस पुष्प में वह विश्व के सम्पूर्ण सौन्दर्य का अनुभव करने लगता है, उसको ग्राम के चरवाहे रोज देखते हैं, उस ओर उनकी दृष्टि तक नहीं जाती। उनके लिये उस पुष्प का अस्तित्व उतना ही है, जितना कि रास्ते में पड़ी हुई काठ, पत्थर तथा अन्य सामान्य वस्तुओं का। वे उस पुष्प में किसी भी प्रकार की विशेष भावना का आरोप नहीं करते। असल में यह प्राणी भावमय है। जिसमें जैसे भाव होंगे उसे उस वस्तु में वे ही भाव दृष्टिगोचर होंगे। इसी भाव को लेकर तो गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है- जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी॥ महाप्रभु के शरीर में भी भक्त अपनी-अपनी भावना के अनुसार नाना रूपों के दर्शन करने लगे। कोई तो प्रभु को वराह के रूप में देखता, कोई उनके शरीर में नृसिंहरूप के दर्शन करता, कोई वामनभाव का अध्यारोप करता। किसी को प्रभु की मूर्ति श्यामसुन्दर रूप में दिखायी देती, किसी को षड्भुजी मूर्ति के दर्शन होते। कोई प्रभु के इस शरीर को न देखकर उन्हें चतुर्भुजरूप से देखता और उनके चारों हस्तों में उसे प्रत्यक्ष शंख, चक्र, गदा और पद्म दिखायी देते। इस प्रकार एक ही प्रभु के श्रीविग्रह को भक्त भिन्न-भिन्न प्रकार से देखने लगे। जिसे प्रभु के चतुर्भुजरूप के दर्शन होते, उसे ही प्रभु की चारों भुजाएँ दीखतीं, अन्य लोगों को वही उनका सामान्य रूप दिखायी देता। जिसे प्रभु का शरीर ज्योतिर्मय दिखायी देता और प्रकाश के अतिरिक्त उसे प्रभु की और मूर्ति दिखायी ही नहीं देती, उसी की आँखों में वह प्रकाश छा जाता, साधारणतः सामान्य लोगों को वह प्रकाश नहीं दीखता, उन लोगों को प्रभु के उसी गौररूप के दर्शन होते रहते। सामान्यतया प्रभु के शरीर में भगवत-भाव और भक्त-भाव ये दो ही भाव भक्तों को दृष्टिगोचर होते। जब इन्हें भगवत-भाव होता, तब ये अपने-आपको बिलकुल भूल जाते, निःसंकोच-भाव से देवमूर्तियों को हटकर स्वयं भगवान के सिंहासन पर विराजमान हो जाते और अपने को भगवान कहने लगते। उस अवस्था में भक्तवृन्द उनकी भगवान की तरह विधिवत पूजा करते, इनके चरणों को गंगा-जल से धोते, पैरों पर पुष्प-चन्दन तथा तुलसीपत्र चढ़ाते। भाँति-भाँति के उपहार इनके सामने रखते। उस समय ये इन कामों में कुछ भी आपत्ति नहीं करते, यही नहीं, किंतु बड़ी ही प्रसन्नतापूर्वक भक्तों की की हुई पूजा को ग्रहण करते और उनसे आशीर्वाद माँगने का भी आग्रह करते और उन्हें इच्छानुसार वरदान भी देते। यही बात नहीं कि ऐसा भाव इन्हें भगवान का ही आवे, नाना देवी-देवताओं का भाव भी आ जाता था। कभी तो बलदेव के भाव में लाल-लाल आँखें करके जोरों से हुंकार करते और ‘मदिरा-मदिरा’ कहकर शराब माँगते, कभी इन्द्र के आवेश में आकर वज्र को घुमाने लगते। कभी सुदर्शन-चक्र का आह्वान करने लगते। एक दिन एक जोगी बड़े ही सुमधुर स्वर से डमरू बजाकर शिव जी के गीत गा-गाकर भिक्षा माँग रहा था। भीख माँगते-माँगते वह इनके भी घर आया। शिवजी के गीतों को सुनकर इन्हें महादेव जी का भाव आ गया और अपनी लटों को बखेरकर शिव जी के भाव में उस गाने वाले के कन्धे पर चढ़ गये और जोरों के साथ कहने लगे- ‘मैं ही शिव हूँ, मैं ही शिव हूँ। तुम वरदान माँगो, मैं तुम्हारी स्तुति से बहुत प्रसन्न हूँ।’ थोड़ी देर के अनन्तर जब इनका वह भाव समाप्त हो गया तो कुछ अचेतन-से होकर उसके कन्धे पर से उतर पड़े और उसे यथेच्छ भिक्षा देकर विदा किया। इस प्रकार भक्तों को अपनी-अपनी भावना के अनुसार नाना रूपों के दर्शन होने लगे और इन्हें भी विभिन्न देवी-देवताओं तथा परम भक्तों के भाव आने लगे। जब वह भाव शान्त हो जाता, तब ये उस भाव में कही हुई सभी बातों को एकदम भूल जाते और एकदम दीन-हीन विनम्र भक्त की भाँति आचरण करने लगते। तब इनका दीन-भाव पत्थर-से-पत्थर हृदय को भी पिघलाने वाला होता। उस समय ये अपने को अत्यन्त ही दीन, अधम और तुच्छ बताकर जोरों के साथ रुदन करते। भक्तों का आलिंगन करके फूट-फूटकर रोने लगते और रोते-रोते कहते- ‘श्रीकृष्ण कहाँ चले गये? भैयाओ! मुझे श्रीकृष्ण से मिलाकर मेरे प्राणों को शीतल कर दो। मेरी विरह-वेदना को श्रीकृष्ण का पता बताकर शान्ति प्रदान करो। मेरा मोहन मुझे बिलखता छोड़कर कहाँ चला गया?’ इसी प्रकार प्रेम में विह्वल होकर अद्वैताचार्य आदि वृद्ध भक्तों के पैरों को पकड़ लेते और उनके पैरों में अपना माथा रगड़ने लगते। सबको बार-बार प्रणाम करते। यदि उस समय इनकी कोई पूजा करने का प्रयत्न करता अथवा इन्हें भगवान कह देता तो ये दुःखी होकर गंगा जी में कूदने के लिये दौड़ते। इसीलिये इनकी साधारण दशा में न तो इनकी कोई पूजा ही करता और न इन्हें भगवान ही कहता। वैसे भक्तों के मन में सदा एक ही भाव रहता। जब ये साधारण भाव में रहते, तब एक अमानी भक्त के समान श्रद्धा-भक्ति के सहित गंगाजी को साष्टांग प्रणाम करते, गंगाजल का आचमन करते, ठाकुर जी का विधिवत पूजन करते तथा तुलसी जी को जल चढ़ाते और उनकी भक्तिभाव से प्रदक्षिणा करते। भगवत-भाव में इन सभी बातों को भुलाकर स्वयं ईश्वरीय आचरण करने लगते। भावावेश के अनन्तर यदि इनसे कोई कुछ पूछता तो बड़ी ही दीनता के साथ उत्तर देते- ‘भैया! हमें कुछ पता नहीं कि हम अचेतनावस्था में न जाने क्या-क्या बक गये। आप लोग इन बातों का कुछ बुरा न मानें। हमारे अपराधों को क्षमा ही करते रहें, ऐसा आशीर्वाद दें, जिससे अचेतनावस्था में भी हमारे मुख से कोई ऐसी बात न निकलने पावे जिसके कारण हम आपके तथा श्रीकृष्ण के सम्मुख अपराधी बनें।’ संकीर्तन में भी ये दो भावों से नृत्य करते। कभी तो भक्त-भाव से बड़ी ही सरलता के साथ नृत्य करते। उस समय का इनका नृत्य बड़ा ही मधुर होता। भक्तभाव में ये संकीर्तन करते-करते भक्तों की चरण-धूलि सिर पर चढ़ाते और उन्हें बार-बार प्रणाम करते। बीच-बीच में पछाड़ें खा-खाकर गिर पड़ते। कभी-कभी तो इतने जोरों के साथ गिरते कि सभी भक्त इनकी दशा देखकर घबड़ा जाते थे। शचीमाता तो कभी इन्हें इस प्रकार पछाड़ खाकर गिरते देख परम अधीर हो जातीं और रोते-रोते भगवान से प्रार्थना करतीं कि ‘हे अशरण-शरण! मेरे निमाई को इतना दुःख मत दो।’ इसीलिये सभी भक्त संकीर्तन के समय इनकी बड़ी देख-रेख रखते और इन्हें चारों ओर से पकड़े रहते कि कहीं मूर्च्छित होकर गिर न पड़ें। कभी-कभी ये भावावेश में आकर भी संकीर्तन करने लगते। तब इनका नृत्य बड़ा ही अद्भुत और अलौकिक होता था, उस समय इन्हें स्पर्श करने की भक्तों को हिम्मत नहीं होती थी, ये नृत्य के समय में जोरों से हुंकार करने लगते। इनकी हुंकार से दिशाएँ गूँजने लगतीं और पदाघात से पृथ्वी हिलने-सी लगती। उस समय सभी कीर्तन करने वाले भक्त विस्मित होकर एक प्रकार के आकर्षण में खिंचे हुए-से मन्त्र-मुग्ध की भाँति सभी क्रियाओं को करते रहते। उन्हें बाह्यज्ञान बिलकुल रहता नहीं था। उस नृत्य से सभी को बड़ा ही आनन्द प्राप्त होता था। इस प्रकार कभी-कभी तो नृत्य-संकीर्तन करते-करते पूरी रात्रि बीत जाती और खूब दिन भी निकल आता तो भी संकीर्तन समाप्त नहीं होता था। एक-एक करके बहुत-से भावुक भक्त नवद्वीप में आ-आकर वास करने लगे और श्रीवास के घर संकीर्तन में आकर सम्मिलित होने लगे। धीरे-धीरे भक्तों का एक अच्छा खासा परिकर बन गया। इनमें अद्वैताचार्य, नित्यानन्द प्रभु और हरिदास- ये तीन प्रधान भक्त समझे जाते थे। वैसे तो सभी प्रधान थे, भक्तों में प्रधान-अप्रधान भी क्या? किंतु ये तीनों सर्वस्वत्यागी, परम विरक्त और महाप्रभु के बहुत ही अन्तरंग भक्त थे। श्रीवास को छोड़कर इन्हीं तीनों पर प्रभु की अत्यन्त कृपा थी। इनके ही द्वारा वे अपना सब काम कराना चाहते थे। इनमें से श्रीअद्वैताचार्य और अवधूत नित्यानन्द जी का सामान्य परिचय तो पाठकों को प्राप्त हो ही चुका है। अब भक्ताग्रगण्य श्रीहरिदास का संक्षिप्त परिचय तो पाठकों को अगले अध्यायों में मिलेगा। इन महाभागवत वैष्णवशिरोमणि भक्त ने नाम-जप का जितना माहात्म्य प्रकट किया है, उतना भगवन्नाम का माहात्म्य किसी ने प्रकट नहीं किया। इन्हें भगवन्नाम-माहात्म्य का सजीव अवतार ही समझना चाहिये। श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::---------- - प्रभुदत्त ब्रह्मचारी श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली (123) गीताप्रेस (गोरखपुर) "जय जय श्री राधे"******************************************* "श्रीजी की चरण सेवा" की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज से जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें👇by Vnita Kasnia Punjab ❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️मेरे कान्हा❤तुझे क्या पता "तेरे इन्तजार" में हमने कैसे वक़्त गुजारा है एक बार नहीं हजारों बार "तेरी तस्वीर" को निहारा है❤💚❤❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️❤️जय श्री कृष्ण❤️,

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तुम्हारी जय हो वीर हनुमान, ओ राम दूत मत वाले हो बड़े दिल वाले जगत में ऊंची तुम्हारी शान , By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब तुम्हारी जय हो वीर हनुमान, भूख लगी तो समज के फल सूरज को मुख में डाला, अन्धकार फैला श्रिस्ति में हाहाकार विकराला, आन करि विनती देवो ने विपदा को किया निवार, तुम्हारी जय हो वीर हनुमान, सोने की लंका को जला कर रख का ढेर बनाया, तहस मेहस बगियन कर दी अक्षय को मार गिराया, लाये संजीवन भुटटी बचाई भाई लखन की जान, तुम्हारी जय हो वीर हनुमान, रोम रोम में राम रमे बस राम भजन ही भाये, सरल तुम्हारा भजन करे जो संकट उस के मिटाये, तेल सिंधुर चढ़ाये जो लखा दिया अबे का दान, तुम्हारी जय हो वीर हनुमान,,

Valmiki Ramayan Sunderkand Sarg 27 sanskritt hindi Anuvaad valmiki ramayana onlineBy समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब:🥦🌹🙏🙏🌹🥦इत्युक्ताः सीतया घोरा राक्षस्यः क्रोधमूर्छिताः। काश्चिज्जग्मुस्तदाख्यातुं रावणस्य तरखिनः ॥१॥ सीता की ये बातें सुन वे राक्षसी बहुत कुपित हुई और उनमें से कोई कोई तो इन बातों को कहने के लिये बलवान् रावण के पास चली गयीं ॥१॥ और जो रह गयीं वे भयङ्कररूप वाली राक्षसियां सीता के पास जा पूर्ववत् कठोर और बुरे बुरे वचन कहने लगीं ॥२॥ अधेदानीं तवानार्ये सीते पापविनिश्चये। राक्षस्यो भक्षयिष्यन्ति मांसमेतद्यथासुखम् ॥ ३॥ वे बोली हे पापिन हे दुर्बुद्ध आज अभी ये सब राक्षसियों मज़े में तेरे मांस को खा डालेंगी ॥ ३ ॥सीतां ताभिरनार्याथिईष्ट्वा सन्तर्जितां तदा । राक्षसी त्रिजटा वृद्धा शयाना वाक्यमब्रवीत् ॥४॥ इन सब दयारहित राक्षसियों को सीता जी के प्रति तर्जन करते देख त्रिजटा नामक एक वृद्धा राक्षसी लेटे लेटे ही कहने लगी॥४॥ Valmiki-Ramayan-Sunderkand-Sarg-27-sanskritt-hindi-Anuvaad-valmiki-ramayana-onlineआत्मानं खादतानार्या न सीतां भक्षयिष्यथ । जनकस्य सुतामिष्टां स्नुषां दशरथस्य च ॥ ५ ॥ अरी दुष्टानो तुम अपने आपको खाश्रो तो भले ही खा डालो पर जनक की दुलारी और महाराज दशरथ की बहू सीता को तुम नहीं खाने पाोगी ॥ ५ ॥ स्वप्नो ह्यद्य मया दृष्टो दारुणो रोमहर्षणः । राक्षसानामभावाय भर्तुरस्या जियाय च ॥६॥ क्योंकि आज मैंने एक बड़ा भयङ्कर और रोमाञ्चकारी स्वप्न देखा है। जिसका फल है राक्षसों का नाश और इसके पति को विजय ॥६॥ एवमुक्तास्त्रिजटया राक्षस्यः क्रोधमूर्छिताः । सर्वा एवाब्रुवन्भीतास्त्रिजटां तामिदं वचः ॥ ७॥त्रिजटा के ये वचन सुन उन राक्षसियों का क्रोध दूर हो गया और वे सब की सब भयभीत हो त्रिजटा से यह बोलीं ॥ ७॥ बतला तो रात को तूने कैसा स्वप्न देखा है । जब उन राक्षसियों ने इस प्रकार पूँछा तब उस समय त्रिजटा उनको अपने स्वप्न का वृत्तान्त बतलाने लगो। वह बोलो मैंने स्वप्न में देखा है कि हाथीदांत की बनी और आकाशचारिणी पालकी में ॥ ८॥शुक्लमाल्याम्बरधरो लक्ष्मणेन सहागतः॥ १० ॥ जिसमें सहस्रों हंस जुते हुए हैं श्रीरामचन्द्र जी लक्ष्मण सहित सफेद वस्त्र और सफेद पुष्पमालाएँ पहिने हुए बैठे हैं और लङ्का में आये हैं ॥ १० ॥ स्वप्ने चाद्य मया दृष्टा सीता शुक्लाम्बराहता। सागरेण परिक्षिप्तं श्वेतं पर्वतमास्थिता ॥ ११ ॥ आज स्वप्न में मैंने सीता को सफेद साड़ी पहिने हुए और समुद्र से घिरे हुए एक सफेद पर्वत के ऊपर बैठे हुए देखा है ॥११॥ सुन्दरकाण्डे र आरूढः शैलसङ्काशं चचार सहलक्ष्मणः । ततस्तौ नरशार्दूलौ दीप्यमानौ स्वतेजसा ॥ १३ ॥ उस पर्वत के ऊपर श्रीरामचन्द्र जी के साथ सीता जी वैसे ही बैठी हैं जैसे सूर्य के साथ प्रभा । फिर मैंने देखा कि श्रीरामचन्द्र जी चार दांतों वाले और पर्वत के समान डीलडौल वाले एक बड़े गज की पीठ पर लक्ष्मण सहित सवार हो चले जाते हैं। फिर देखा है कि वे दोनों नरसिंह जो अपने तेज से दमक रहे हैं ॥१२॥ १३।। शुक्लमाल्याम्बरधरौ जानकी पर्युपस्थितौ । ततस्तस्य नगस्याग्रे ह्याकाशस्थस्य दन्तिनः ॥ १४ ॥ सफेद वस्त्रों और सफेद फूल की मालाओं को पहिने हुए जानकी के निकट आये हुए हैं। फिर देखा कि उस पर्वत के शिखर पर आकाश में खड़े हाथी के ऊपर ॥१४॥ जी भा परिगृहीतस्य जानकी स्कन्धमाश्रिता । जी भतरङ्कात्समुत्पत्य ततः कमललोचना ॥ १५ ॥जानकी जी सवार हुई हैं। उस गज को इनके पति श्रीरामचन्द्र जी पकड़े हुए हैं। तदनन्तर कमलनयनी जानकी गोदी से उछली हैं। उस समय मैंने देखा कि ॥ १५॥जानकी सूर्य और चन्द्रमा को अपने दोनों हाथों से पोंछ रही हैं। तदनन्तर विशालाक्षी सीता सहित उन दोनों राजकुमारों को अपनी पीठ पर चढ़ा वह उत्तम गज श्रा कर लङ्का के ऊपर ठहर गया है । फिर देखा कि आठ बैलों से युक्त रथ में स्वयं ॥ १६ ॥ १७॥आप बैठे और अपनी भार्या सीता को साथ ले यहाँ आये हैं। फिर बलवान श्रीरामचन्द्र अपने भाई लक्ष्मण और भार्या सीता सहित ॥ १८ ॥ आरुह्य पुष्पकं दिव्यं विमानं सूर्यसन्निभम् । उत्तरां दिशमालोक्य जगाम पुरुषोत्तमः ॥ १९ ॥ सूर्य की तरह इसकते हुए पुष्पक विमान पर सवार हो उत्तर की ओर जाते हुए देख पड़े ॥ १९ ॥ एवं स्वप्ने मया दृष्टो रामो विष्णुपराक्रमः । लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया सह राघवः ॥ २० ॥ इस प्रकार स्वप्न में मैंने अपनी पत्नी सीता सहित विष्णु भगवान् के सदश पराक्रमी श्रीरामचन्द्र को तथा उनके भाई लक्ष्मण को देखा है।॥ २०॥ नहि रामो महातेजाः शक्यो जेतुं सुरासुरैः। राक्षसैर्वापि चान्यैर्वा स्वर्गः पापजनैरिव ॥ २१ ॥ जैसे पापियों के लिये स्वर्ग में जाना असम्भव है वैसे ही देव दानव अथवा राक्षसों के लिये श्रीरामचन्द्र का जीतना असम्भव है ॥२१॥ रावणश्च मया दृष्टः क्षितौ तैलसमुक्षितः। रक्तवासाः पिबन्यत्तः करवीरकृतस्रजः ॥ २२ ॥ मैंने रावण को भी स्वप्न में देखा है कि वह तेल में डूबा हुआ जमीन पर लोट रहा है। शराब पिये उन्मत्त हुआ लाल कपड़े और कनेर के फूलों की माला पहिने हुए ॥ २२॥ विमानात्पुष्पकादद्य रावणः पतितो भुवि । कृष्यमाणः स्त्रिया दृष्टो मुण्डः कृष्णाम्बरः पुनः ॥ २३॥ पुष्पक विमान से रावण पृथिवी पर आ गिरा है। फिर देखा है कि उसको पकड़ कर स्त्रियाँ खींच रही हैं । उसका मूड मुड़ा हुआ है और वह काले कपड़े पहिने हुए है ॥ २३ ॥ रथेन खरयुक्तेन रक्तमाल्यानुलेपनः । पिवंस्तैलं हसन्नृत्यन्भ्रान्तचित्ताकुलेन्द्रियः ॥ २४ ॥ वह लाल माला पहिने और लालचन्दन लगाये गधों के रथ में बैठा है । फिर देखा है कि वह तेल पी रहा है हँस रहा है नाच रहा है और भ्रान्त चित्त हो विकल हो रहा है ॥ २४ ॥गर्दभेन ययौ शीघ्रं दक्षिणां दिशमास्थितः । पुनरेव मया दृष्टो रावणो राक्षसेश्वरः ॥ २५॥ और गधे पर सवार हा जल्दी जल्दी दक्षिण की ओर जा रहा है। फिर मैंने राक्षसराज रावण को देखा कि ॥ २५ ॥ पतितोऽवाक्छिरा भूमौ गर्दभाद्भयमोहितः । सहसात्थाय सम्भ्रान्तो भयातो मदविह्वलः ॥ २६ ॥ वह गधे पर से नीचे मुख कर भूमि पर गिर पड़ा है और भयभीत हो विकल हो रहा है। फिर तुरन्त उठ कर विकल होता हुआ भयभीत और मतवाला ॥ २६ ॥रावण पागल को तरह नग्न हो बार बार दुर्वाक्य कहता हुआ प्रलाप कर रहा है। दुस्सह दुर्गन्ध से युक्त भयङ्कर अन्धकार से व्याप्त नरक की तरह ।। २७ ।। Valmiki-Ramayan-Sunderkand-Sarg-27-sanskritt-hindi-Anuvaad-valmiki-ramayana-online-sunderkandaमलपङ्क प्रविश्याशु मग्नस्तत्र स रावणः । कण्ठे बद्ध वा दशग्रीवं प्रमदा रक्तवासिनी ॥ २८॥ मात्र काली कर्दमलिप्ताङ्गी दिशं याम्यां प्रकर्षति । एवं तत्र मया दृष्टः कुम्भकर्णो निशाचरः ॥ २९ ॥ मल के कीचड़ में जा कर डूब गया है। फिर देखा कि लाल वस्त्र पहिने हुए विकटाकार कोई स्त्री जिसके शरीर में कीचड़ लपटी हुई है गले में रस्सी बांध रावण को दक्षिण की ओर खींच कर लिये जा रही है। इसी प्रकार मैंने निशाचर कुम्भकर्ण का भी देखा है ॥ २८ ॥ २९ ॥ का रावणस्य सुताः सर्वे मुण्डास्तैलसमुक्षिताः । वराहेण दशग्रीवः शिंशुमारेण चेन्द्रजित् ॥ ३०॥ रावण के समस्त पत्रों को मूंड मडाये और तेल में डूबा हुआ हैफिर मैने रावण को शूकर पर मेघनाद को संस पर ॥२०॥ और कुम्भकर्ण को ऊँट पर सवार हो कर दक्षिण दिशा की ओर जाते हुए देखा है। मैंने केवल विभीषण को सफेद छाता ताने ॥ ३१ ॥ शुक्लमाल्याम्बरधरः शुक्लगन्धानुलेपनः । राणा शङ्कदुन्दुभिनिर्घोषैर्वृत्तगीतैरलंकृतः ॥ ३२॥ सफेद फूलों को माला तथा सफेद वस्त्र धारण किये और सफेद सुगन्धित चन्दन लगाये हुए देखा है और देखा है कि उनके सामने शङ्क दुन्दभी बज रही हैं और नाचना गाना हो रहा है ॥ ३२॥ राली आरुह्य शैलसङ्काशं मेघस्तनितनिःस्वनम् । चतुर्दन्तं गजं दिव्यमास्ते तत्र विभीषणः ॥३३॥ फिर विभीषण पर्वत के समान आकारबाले मेघ की तरह गर्जने वाले चार दांतों वाले दिव्य हाथी पर सवार हैं ॥ ३३॥ गज चतुर्भिः सचिवैः सार्धं वैहायसमुपस्थितः। समाजश्च भया दृष्टो गीतवादित्रनिःस्वनः ॥ ३४॥ उसके साथ उसके चार मंत्री हैं और वह आकाशमार्ग में स्थित है। राजसभा में मने गाना बजाना होते हुए देखा है ॥ ३४॥ और देखा है कि लङ्कावासी समस्त राक्षस मद पो रहे हैं लाल फूलों की मालाएँ और लाल ही रंग के कपड़े पहिने हुए हैं। फिर मैंने देखा कि यह रमणीक लङ्कापुरी घोड़ों रथों और हाथियों सहित ॥ ३५ ॥ समुद्र में डूब गयी है और उसके गोपुरद्वार और तोरणद्वार टूट फूट गये हैं। फिर मैंने स्वप्न में देखा है कि रावण द्वारा रक्षित लड़ा किसी बलवान श्रीरामचन्द्र जी के दूत वानर ने जला कर भस्म कर डाली है। राक्षसों की स्त्रियों को मैंने देखा है कि वे शरीर में भस्म लगाये तेल पी रही हैं और मतवाली हो इस लङ्का में बड़े जोर से हंस रही हैं। फिर कुम्भकर्ण आदि यहाँ के प्रधान प्रधान समस्त राक्षस ॥ ३६ ॥ ३७॥ ३८ ॥ रक्तं निवसनं गृह्य प्रविष्टा गोमयदे । अपगच्छत पश्यध्वं सीतामाप स राघवः ॥ ३९ ॥ लाल कपड़े पहिने हुए गोबर भरे कुण्ड में गिर पड़े हैं । सेो हे राक्षसियों तुम सब यहां से चली जायो। देखना सीता श्रीरामचन्द्र जी को शीघ्र मिलती है ।। ३९ ।। भी यदि तुम लोगों ने ऐसा न किया तो कहीं वे परमक्रुद्ध हो राक्षसों के साथ साथ तुम्हें भी मार न डालें । मेरी समझ में तो यह आता है कि अपनी ऐसी प्यारी अत्यन्त कृपापात्री और वनवास में भी साथ देने वाली भार्या की ।। ४० ॥ भत्सितां तर्जितां वाऽपि नानुमंस्यति राघवः । तदलं क्रूरवाक्यैर्वः सान्त्वमेवाभिधीयताम् ।। ४१॥ तुम्हारे द्वारा दुर्दशा की गई देख श्रीरामचन्द्र जी तुमको कभी क्षमा नहीं करेंगे । अतः तुम्हें उचित है कि अब सीता से कठोर वचन मत कहो और अब उससे ऐसी बातें कहो जिससे उसे धीरज बंधे ।। ४१ ।। अभियाचाम वैदेहीमेतद्धि मम रोचते । यस्यामेवंविधः स्वप्नो दुःखितायां प्रदृश्यते ॥ ४२ ॥ मेरी तो यह इच्छा है कि हम सब मिल कर सीता जी से अनुग्रह की प्रार्थना करें। क्योंकि जिस दुखियारी स्त्री के बारे में ऐसा स्वप्न देखा जाता है कि ।। ४२ ॥ सा दुःखैर्विविधैर्मुक्ता प्रियं प्राप्नोत्यनुत्तमम् । भर्सितामपि याचध्वं राक्षस्यः किं विवक्षया ॥४३॥ वह विविध प्रकार के दुःखों से छूट कर अपने प्यारे पति को पाती है। हे राक्षसियों यद्यपि तुम लोगों ने इसको बहुत डराया धमकाया है तो भी तुम इस बात की चिन्ता मत करो ॥ ४३ ॥ अब राक्षसों को श्रीरामचन्द्र से बड़ा भय प्रा पहुँचा है। जब यह जनकनन्दिनी प्रणाम करने से प्रसन्न हो जायगी ॥४४॥ अलमेषा परित्रातुं राक्षस्यो महतो भयात् । अपि चास्या विशालाक्ष्या न किञ्चिदुपलक्षये ॥ ४५॥ विरूपमपि चाङ्गेषु सुमुक्ष्ममपि लक्षणम् । छायावैगुण्यमानं तु शङ्के दुःखमुपस्थितम् ॥ ४६॥ तब राक्षसियों को इस महाभय से बचाने में यह समर्थ होंगी। तुमने इतना डराया धमकाया तिस पर भी इन विशालनयनी सीता के शरीर में दुःख की रेख भी तो नहीं देख पड़ती और न इनके अंग विरूप ही देख पड़ते हैं। इनकी मलिन कान्ति देखने से अवश्य इनके दुःखी होने का सन्देह होता है ॥ ४५ ॥ ४६॥ देवी दुःख नहीं सह सकतीं । मैंने स्वप्न में भी इनको विमान में स्थित देखा है। इससे मुझे जान पड़ता है कि इनके कार्य की सिद्धि निश्चित होने वाली है ॥ ४७॥राक्षसेन्द्रविनाशं च विजयं राघवस्य च । निमित्तभूतमेतत्तु श्रोतुमस्या महत्प्रियम् ॥ ४८॥ और रावण का नाश तथा श्रीरामचन्द्र की जीत भी अवश्य होने वाली है। एक और कारण भी है जिससे इनका शीघ्र एक बड़ा सुखसंवाद सुनना निश्चित जान पड़ता है ॥ ४८ ॥ दृश्यते च स्फुरच्चक्षुः पद्मपत्रमिवायतम् । ईषच्च हृषितो वास्या दक्षिणाया ह्यदक्षिणः। अकस्मादेव वैदेह्या बाहुरेकः प्रकम्पते ॥ ४९ ॥ वह यह कि कमल के तुल्य विशाल इनका वाम नेत्र फरक रहा है और इन परम प्रवीणा जानकी जी की पुलकायमान केवल वामभुजा भी अकस्मात् फरक रही है ॥ ४६॥ न करेणुहस्तप्रतिमः सव्यश्वोरुरनुत्तमः । वेपमानः सूचयति राघवं पुरतः स्थितम् ॥ ५० ॥ और इनकी हाथी की सूड की तरह उत्तर वाम जाँघ का फरकना यह प्रकट करता है कि श्रीरामचन्द्र इनके पास ही खड़े हैं॥५०॥ पक्षी च शाखानिलयं प्रविष्टः पुनः पुनश्चोत्तमसान्त्ववादी । सुस्वागतां वाचमुदीरयानः पुनः पुनश्चोदयतीव हृष्टः ॥५१॥ इति सप्तविंशः सर्गः॥ वृक्ष की डाली पर बैठा हुआ यह पिङ्गलका मादा सारस जो प्रसन्न हो बारबार मधुर वाणी से बोल रही है से मानों श्रीरामचन्द्र जी के आगमन की सूचना दे रही है ॥ ५१॥ सुन्दरकाण्ड का सत्ताइसौं सर्ग पूरा सुन्दरकाण्ड सर्ग 1 श्लोक 1-40,सुन्दरकाण्ड सर्ग 1 श्लोक 44-77,प्रथम सर्ग 78 से 117,Sarg shlok 139 se 161 in hindi,sunderkanda valmiki ramayana in hindihanuman ji ne kiya lanka dahanSunderkanda sanskrit to hindi PathaSarg 12 valmiki ramayanSunderkanda Sarg 26श्लोक १६२ से २१०,सोने की लंका का वर्णन,श्लोक ४६ से ५७,अलकापूरी की तरह लङ्कापुरी,sarg 4, shlok 1-30,सीता की खोज मै निकले,पुष्पक विमान का वर्णन -1,पुष्पक विमान की चाल कितनी थी?भरत निवास नंदीग्राम,स्वागत और राज्याभिषेक,आदर्श रामराज्य,अगस्त्य ऋषि का अयोध्या आगमनअश्वमेध यज्ञ - के फल और सम्पूर्ण विधि विधानसोलह जनपदों के देशों मै अश्वमेघ यज्ञकथा कौन थे राजा सुमद?राम राज्य अयोध्या का वर्णनvishvamitra aur raja trishnku,विश्वामित्र और त्रिशंकुअयोध्या का गुणों से सम्पन्न सनातन माहात्म्य अर्थहनुमान जी लंका में प्रवेशमहर्षि च्यवन संक्षिप्त जीवन परिचयsakat 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**🙏 ओम श्री सूर्य देवाय नमः जी 🙏**कभी आपको लगे कि**मैं अकेला क्या कर सकता हूँ* *तो एक नज़र सूरज* *को देख लेना वो अकेला* *ही सारे संसार को* *आलोकित करता है ।**दु:ख और परिश्रम.... मानव जीवन के लिये नितांत आवश्यक हैं,**By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब*🌹🙏🙏🌹*स्मरण रहे...दु:ख के बिना हृदय निर्मल नहीं होता और परिश्रम के बिना मनुष्य का विकास नहीं होता...!!* 🌷🙏जय सूर्य देव 🙏🌷 *🙏 शुभ प्रभात, शुभ रविवार 🙏**