सारे तीर्थ धाम आपके चरणो में।हे गुरुदेव प्रणाम आपके चरणो में। (Vnita Kasnia punjab)हृदय में माँ गौरी लक्ष्मी, कंठ शारदा माता है।जो भी मुख से वचन कहें, वो वचन सिद्ध हो जाता है।हैं गुरु ब्रह्मा, हैं गुरु विष्णु, हैं शंकर भगवान आपके चरणो में।हे गुरुदेव प्रणाम आपके चरणो में।जनम के दाता मात पिता हैं, आप करम के दाता हैं।आप मिलाते हैं ईश्वर से, आप ही भाग्य विधाता हैं।दुखिया मन को रोगी तन को, मिलता है आराम आपके चरणो में।हे गुरुदेव प्रणाम आपके चरणो में।निर्बल को बलवान बना दो, मूर्ख को गुणवान प्रभु।देवकमल और वंसी को भी ज्ञान का दो वरदान गुरु।हे महा दानी हे महा ज्ञानी, रहूँ मैं सुबहो-शाम आपके चरणो में।हे गुरुदेव प्रणाम आपके चरणो में।कर्ता करे ना कर सके, पर गुरु किए सब होये।सात द्वीप नौ खंड मे, मेरे गुरु से बड़ा ना कोए॥सब धरती कागज़ करूँ, लेखनी सब वनराय।समुद्र को स्याही, पर गुरु गुण लिख्यो ना जाए॥सारे तीर्थ धाम आपके चरणो में।हे गुरुदेव प्रणाम आपके चरणो में।

Comments

Popular posts from this blog

तुम्हारी जय हो वीर हनुमान, ओ राम दूत मत वाले हो बड़े दिल वाले जगत में ऊंची तुम्हारी शान , By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब तुम्हारी जय हो वीर हनुमान, भूख लगी तो समज के फल सूरज को मुख में डाला, अन्धकार फैला श्रिस्ति में हाहाकार विकराला, आन करि विनती देवो ने विपदा को किया निवार, तुम्हारी जय हो वीर हनुमान, सोने की लंका को जला कर रख का ढेर बनाया, तहस मेहस बगियन कर दी अक्षय को मार गिराया, लाये संजीवन भुटटी बचाई भाई लखन की जान, तुम्हारी जय हो वीर हनुमान, रोम रोम में राम रमे बस राम भजन ही भाये, सरल तुम्हारा भजन करे जो संकट उस के मिटाये, तेल सिंधुर चढ़ाये जो लखा दिया अबे का दान, तुम्हारी जय हो वीर हनुमान,,

Valmiki Ramayan Sunderkand Sarg 27 sanskritt hindi Anuvaad valmiki ramayana onlineBy समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब:🥦🌹🙏🙏🌹🥦इत्युक्ताः सीतया घोरा राक्षस्यः क्रोधमूर्छिताः। काश्चिज्जग्मुस्तदाख्यातुं रावणस्य तरखिनः ॥१॥ सीता की ये बातें सुन वे राक्षसी बहुत कुपित हुई और उनमें से कोई कोई तो इन बातों को कहने के लिये बलवान् रावण के पास चली गयीं ॥१॥ और जो रह गयीं वे भयङ्कररूप वाली राक्षसियां सीता के पास जा पूर्ववत् कठोर और बुरे बुरे वचन कहने लगीं ॥२॥ अधेदानीं तवानार्ये सीते पापविनिश्चये। राक्षस्यो भक्षयिष्यन्ति मांसमेतद्यथासुखम् ॥ ३॥ वे बोली हे पापिन हे दुर्बुद्ध आज अभी ये सब राक्षसियों मज़े में तेरे मांस को खा डालेंगी ॥ ३ ॥सीतां ताभिरनार्याथिईष्ट्वा सन्तर्जितां तदा । राक्षसी त्रिजटा वृद्धा शयाना वाक्यमब्रवीत् ॥४॥ इन सब दयारहित राक्षसियों को सीता जी के प्रति तर्जन करते देख त्रिजटा नामक एक वृद्धा राक्षसी लेटे लेटे ही कहने लगी॥४॥ Valmiki-Ramayan-Sunderkand-Sarg-27-sanskritt-hindi-Anuvaad-valmiki-ramayana-onlineआत्मानं खादतानार्या न सीतां भक्षयिष्यथ । जनकस्य सुतामिष्टां स्नुषां दशरथस्य च ॥ ५ ॥ अरी दुष्टानो तुम अपने आपको खाश्रो तो भले ही खा डालो पर जनक की दुलारी और महाराज दशरथ की बहू सीता को तुम नहीं खाने पाोगी ॥ ५ ॥ स्वप्नो ह्यद्य मया दृष्टो दारुणो रोमहर्षणः । राक्षसानामभावाय भर्तुरस्या जियाय च ॥६॥ क्योंकि आज मैंने एक बड़ा भयङ्कर और रोमाञ्चकारी स्वप्न देखा है। जिसका फल है राक्षसों का नाश और इसके पति को विजय ॥६॥ एवमुक्तास्त्रिजटया राक्षस्यः क्रोधमूर्छिताः । सर्वा एवाब्रुवन्भीतास्त्रिजटां तामिदं वचः ॥ ७॥त्रिजटा के ये वचन सुन उन राक्षसियों का क्रोध दूर हो गया और वे सब की सब भयभीत हो त्रिजटा से यह बोलीं ॥ ७॥ बतला तो रात को तूने कैसा स्वप्न देखा है । जब उन राक्षसियों ने इस प्रकार पूँछा तब उस समय त्रिजटा उनको अपने स्वप्न का वृत्तान्त बतलाने लगो। वह बोलो मैंने स्वप्न में देखा है कि हाथीदांत की बनी और आकाशचारिणी पालकी में ॥ ८॥शुक्लमाल्याम्बरधरो लक्ष्मणेन सहागतः॥ १० ॥ जिसमें सहस्रों हंस जुते हुए हैं श्रीरामचन्द्र जी लक्ष्मण सहित सफेद वस्त्र और सफेद पुष्पमालाएँ पहिने हुए बैठे हैं और लङ्का में आये हैं ॥ १० ॥ स्वप्ने चाद्य मया दृष्टा सीता शुक्लाम्बराहता। सागरेण परिक्षिप्तं श्वेतं पर्वतमास्थिता ॥ ११ ॥ आज स्वप्न में मैंने सीता को सफेद साड़ी पहिने हुए और समुद्र से घिरे हुए एक सफेद पर्वत के ऊपर बैठे हुए देखा है ॥११॥ सुन्दरकाण्डे र आरूढः शैलसङ्काशं चचार सहलक्ष्मणः । ततस्तौ नरशार्दूलौ दीप्यमानौ स्वतेजसा ॥ १३ ॥ उस पर्वत के ऊपर श्रीरामचन्द्र जी के साथ सीता जी वैसे ही बैठी हैं जैसे सूर्य के साथ प्रभा । फिर मैंने देखा कि श्रीरामचन्द्र जी चार दांतों वाले और पर्वत के समान डीलडौल वाले एक बड़े गज की पीठ पर लक्ष्मण सहित सवार हो चले जाते हैं। फिर देखा है कि वे दोनों नरसिंह जो अपने तेज से दमक रहे हैं ॥१२॥ १३।। शुक्लमाल्याम्बरधरौ जानकी पर्युपस्थितौ । ततस्तस्य नगस्याग्रे ह्याकाशस्थस्य दन्तिनः ॥ १४ ॥ सफेद वस्त्रों और सफेद फूल की मालाओं को पहिने हुए जानकी के निकट आये हुए हैं। फिर देखा कि उस पर्वत के शिखर पर आकाश में खड़े हाथी के ऊपर ॥१४॥ जी भा परिगृहीतस्य जानकी स्कन्धमाश्रिता । जी भतरङ्कात्समुत्पत्य ततः कमललोचना ॥ १५ ॥जानकी जी सवार हुई हैं। उस गज को इनके पति श्रीरामचन्द्र जी पकड़े हुए हैं। तदनन्तर कमलनयनी जानकी गोदी से उछली हैं। उस समय मैंने देखा कि ॥ १५॥जानकी सूर्य और चन्द्रमा को अपने दोनों हाथों से पोंछ रही हैं। तदनन्तर विशालाक्षी सीता सहित उन दोनों राजकुमारों को अपनी पीठ पर चढ़ा वह उत्तम गज श्रा कर लङ्का के ऊपर ठहर गया है । फिर देखा कि आठ बैलों से युक्त रथ में स्वयं ॥ १६ ॥ १७॥आप बैठे और अपनी भार्या सीता को साथ ले यहाँ आये हैं। फिर बलवान श्रीरामचन्द्र अपने भाई लक्ष्मण और भार्या सीता सहित ॥ १८ ॥ आरुह्य पुष्पकं दिव्यं विमानं सूर्यसन्निभम् । उत्तरां दिशमालोक्य जगाम पुरुषोत्तमः ॥ १९ ॥ सूर्य की तरह इसकते हुए पुष्पक विमान पर सवार हो उत्तर की ओर जाते हुए देख पड़े ॥ १९ ॥ एवं स्वप्ने मया दृष्टो रामो विष्णुपराक्रमः । लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया सह राघवः ॥ २० ॥ इस प्रकार स्वप्न में मैंने अपनी पत्नी सीता सहित विष्णु भगवान् के सदश पराक्रमी श्रीरामचन्द्र को तथा उनके भाई लक्ष्मण को देखा है।॥ २०॥ नहि रामो महातेजाः शक्यो जेतुं सुरासुरैः। राक्षसैर्वापि चान्यैर्वा स्वर्गः पापजनैरिव ॥ २१ ॥ जैसे पापियों के लिये स्वर्ग में जाना असम्भव है वैसे ही देव दानव अथवा राक्षसों के लिये श्रीरामचन्द्र का जीतना असम्भव है ॥२१॥ रावणश्च मया दृष्टः क्षितौ तैलसमुक्षितः। रक्तवासाः पिबन्यत्तः करवीरकृतस्रजः ॥ २२ ॥ मैंने रावण को भी स्वप्न में देखा है कि वह तेल में डूबा हुआ जमीन पर लोट रहा है। शराब पिये उन्मत्त हुआ लाल कपड़े और कनेर के फूलों की माला पहिने हुए ॥ २२॥ विमानात्पुष्पकादद्य रावणः पतितो भुवि । कृष्यमाणः स्त्रिया दृष्टो मुण्डः कृष्णाम्बरः पुनः ॥ २३॥ पुष्पक विमान से रावण पृथिवी पर आ गिरा है। फिर देखा है कि उसको पकड़ कर स्त्रियाँ खींच रही हैं । उसका मूड मुड़ा हुआ है और वह काले कपड़े पहिने हुए है ॥ २३ ॥ रथेन खरयुक्तेन रक्तमाल्यानुलेपनः । पिवंस्तैलं हसन्नृत्यन्भ्रान्तचित्ताकुलेन्द्रियः ॥ २४ ॥ वह लाल माला पहिने और लालचन्दन लगाये गधों के रथ में बैठा है । फिर देखा है कि वह तेल पी रहा है हँस रहा है नाच रहा है और भ्रान्त चित्त हो विकल हो रहा है ॥ २४ ॥गर्दभेन ययौ शीघ्रं दक्षिणां दिशमास्थितः । पुनरेव मया दृष्टो रावणो राक्षसेश्वरः ॥ २५॥ और गधे पर सवार हा जल्दी जल्दी दक्षिण की ओर जा रहा है। फिर मैंने राक्षसराज रावण को देखा कि ॥ २५ ॥ पतितोऽवाक्छिरा भूमौ गर्दभाद्भयमोहितः । सहसात्थाय सम्भ्रान्तो भयातो मदविह्वलः ॥ २६ ॥ वह गधे पर से नीचे मुख कर भूमि पर गिर पड़ा है और भयभीत हो विकल हो रहा है। फिर तुरन्त उठ कर विकल होता हुआ भयभीत और मतवाला ॥ २६ ॥रावण पागल को तरह नग्न हो बार बार दुर्वाक्य कहता हुआ प्रलाप कर रहा है। दुस्सह दुर्गन्ध से युक्त भयङ्कर अन्धकार से व्याप्त नरक की तरह ।। २७ ।। Valmiki-Ramayan-Sunderkand-Sarg-27-sanskritt-hindi-Anuvaad-valmiki-ramayana-online-sunderkandaमलपङ्क प्रविश्याशु मग्नस्तत्र स रावणः । कण्ठे बद्ध वा दशग्रीवं प्रमदा रक्तवासिनी ॥ २८॥ मात्र काली कर्दमलिप्ताङ्गी दिशं याम्यां प्रकर्षति । एवं तत्र मया दृष्टः कुम्भकर्णो निशाचरः ॥ २९ ॥ मल के कीचड़ में जा कर डूब गया है। फिर देखा कि लाल वस्त्र पहिने हुए विकटाकार कोई स्त्री जिसके शरीर में कीचड़ लपटी हुई है गले में रस्सी बांध रावण को दक्षिण की ओर खींच कर लिये जा रही है। इसी प्रकार मैंने निशाचर कुम्भकर्ण का भी देखा है ॥ २८ ॥ २९ ॥ का रावणस्य सुताः सर्वे मुण्डास्तैलसमुक्षिताः । वराहेण दशग्रीवः शिंशुमारेण चेन्द्रजित् ॥ ३०॥ रावण के समस्त पत्रों को मूंड मडाये और तेल में डूबा हुआ हैफिर मैने रावण को शूकर पर मेघनाद को संस पर ॥२०॥ और कुम्भकर्ण को ऊँट पर सवार हो कर दक्षिण दिशा की ओर जाते हुए देखा है। मैंने केवल विभीषण को सफेद छाता ताने ॥ ३१ ॥ शुक्लमाल्याम्बरधरः शुक्लगन्धानुलेपनः । राणा शङ्कदुन्दुभिनिर्घोषैर्वृत्तगीतैरलंकृतः ॥ ३२॥ सफेद फूलों को माला तथा सफेद वस्त्र धारण किये और सफेद सुगन्धित चन्दन लगाये हुए देखा है और देखा है कि उनके सामने शङ्क दुन्दभी बज रही हैं और नाचना गाना हो रहा है ॥ ३२॥ राली आरुह्य शैलसङ्काशं मेघस्तनितनिःस्वनम् । चतुर्दन्तं गजं दिव्यमास्ते तत्र विभीषणः ॥३३॥ फिर विभीषण पर्वत के समान आकारबाले मेघ की तरह गर्जने वाले चार दांतों वाले दिव्य हाथी पर सवार हैं ॥ ३३॥ गज चतुर्भिः सचिवैः सार्धं वैहायसमुपस्थितः। समाजश्च भया दृष्टो गीतवादित्रनिःस्वनः ॥ ३४॥ उसके साथ उसके चार मंत्री हैं और वह आकाशमार्ग में स्थित है। राजसभा में मने गाना बजाना होते हुए देखा है ॥ ३४॥ और देखा है कि लङ्कावासी समस्त राक्षस मद पो रहे हैं लाल फूलों की मालाएँ और लाल ही रंग के कपड़े पहिने हुए हैं। फिर मैंने देखा कि यह रमणीक लङ्कापुरी घोड़ों रथों और हाथियों सहित ॥ ३५ ॥ समुद्र में डूब गयी है और उसके गोपुरद्वार और तोरणद्वार टूट फूट गये हैं। फिर मैंने स्वप्न में देखा है कि रावण द्वारा रक्षित लड़ा किसी बलवान श्रीरामचन्द्र जी के दूत वानर ने जला कर भस्म कर डाली है। राक्षसों की स्त्रियों को मैंने देखा है कि वे शरीर में भस्म लगाये तेल पी रही हैं और मतवाली हो इस लङ्का में बड़े जोर से हंस रही हैं। फिर कुम्भकर्ण आदि यहाँ के प्रधान प्रधान समस्त राक्षस ॥ ३६ ॥ ३७॥ ३८ ॥ रक्तं निवसनं गृह्य प्रविष्टा गोमयदे । अपगच्छत पश्यध्वं सीतामाप स राघवः ॥ ३९ ॥ लाल कपड़े पहिने हुए गोबर भरे कुण्ड में गिर पड़े हैं । सेो हे राक्षसियों तुम सब यहां से चली जायो। देखना सीता श्रीरामचन्द्र जी को शीघ्र मिलती है ।। ३९ ।। भी यदि तुम लोगों ने ऐसा न किया तो कहीं वे परमक्रुद्ध हो राक्षसों के साथ साथ तुम्हें भी मार न डालें । मेरी समझ में तो यह आता है कि अपनी ऐसी प्यारी अत्यन्त कृपापात्री और वनवास में भी साथ देने वाली भार्या की ।। ४० ॥ भत्सितां तर्जितां वाऽपि नानुमंस्यति राघवः । तदलं क्रूरवाक्यैर्वः सान्त्वमेवाभिधीयताम् ।। ४१॥ तुम्हारे द्वारा दुर्दशा की गई देख श्रीरामचन्द्र जी तुमको कभी क्षमा नहीं करेंगे । अतः तुम्हें उचित है कि अब सीता से कठोर वचन मत कहो और अब उससे ऐसी बातें कहो जिससे उसे धीरज बंधे ।। ४१ ।। अभियाचाम वैदेहीमेतद्धि मम रोचते । यस्यामेवंविधः स्वप्नो दुःखितायां प्रदृश्यते ॥ ४२ ॥ मेरी तो यह इच्छा है कि हम सब मिल कर सीता जी से अनुग्रह की प्रार्थना करें। क्योंकि जिस दुखियारी स्त्री के बारे में ऐसा स्वप्न देखा जाता है कि ।। ४२ ॥ सा दुःखैर्विविधैर्मुक्ता प्रियं प्राप्नोत्यनुत्तमम् । भर्सितामपि याचध्वं राक्षस्यः किं विवक्षया ॥४३॥ वह विविध प्रकार के दुःखों से छूट कर अपने प्यारे पति को पाती है। हे राक्षसियों यद्यपि तुम लोगों ने इसको बहुत डराया धमकाया है तो भी तुम इस बात की चिन्ता मत करो ॥ ४३ ॥ अब राक्षसों को श्रीरामचन्द्र से बड़ा भय प्रा पहुँचा है। जब यह जनकनन्दिनी प्रणाम करने से प्रसन्न हो जायगी ॥४४॥ अलमेषा परित्रातुं राक्षस्यो महतो भयात् । अपि चास्या विशालाक्ष्या न किञ्चिदुपलक्षये ॥ ४५॥ विरूपमपि चाङ्गेषु सुमुक्ष्ममपि लक्षणम् । छायावैगुण्यमानं तु शङ्के दुःखमुपस्थितम् ॥ ४६॥ तब राक्षसियों को इस महाभय से बचाने में यह समर्थ होंगी। तुमने इतना डराया धमकाया तिस पर भी इन विशालनयनी सीता के शरीर में दुःख की रेख भी तो नहीं देख पड़ती और न इनके अंग विरूप ही देख पड़ते हैं। इनकी मलिन कान्ति देखने से अवश्य इनके दुःखी होने का सन्देह होता है ॥ ४५ ॥ ४६॥ देवी दुःख नहीं सह सकतीं । मैंने स्वप्न में भी इनको विमान में स्थित देखा है। इससे मुझे जान पड़ता है कि इनके कार्य की सिद्धि निश्चित होने वाली है ॥ ४७॥राक्षसेन्द्रविनाशं च विजयं राघवस्य च । निमित्तभूतमेतत्तु श्रोतुमस्या महत्प्रियम् ॥ ४८॥ और रावण का नाश तथा श्रीरामचन्द्र की जीत भी अवश्य होने वाली है। एक और कारण भी है जिससे इनका शीघ्र एक बड़ा सुखसंवाद सुनना निश्चित जान पड़ता है ॥ ४८ ॥ दृश्यते च स्फुरच्चक्षुः पद्मपत्रमिवायतम् । ईषच्च हृषितो वास्या दक्षिणाया ह्यदक्षिणः। अकस्मादेव वैदेह्या बाहुरेकः प्रकम्पते ॥ ४९ ॥ वह यह कि कमल के तुल्य विशाल इनका वाम नेत्र फरक रहा है और इन परम प्रवीणा जानकी जी की पुलकायमान केवल वामभुजा भी अकस्मात् फरक रही है ॥ ४६॥ न करेणुहस्तप्रतिमः सव्यश्वोरुरनुत्तमः । वेपमानः सूचयति राघवं पुरतः स्थितम् ॥ ५० ॥ और इनकी हाथी की सूड की तरह उत्तर वाम जाँघ का फरकना यह प्रकट करता है कि श्रीरामचन्द्र इनके पास ही खड़े हैं॥५०॥ पक्षी च शाखानिलयं प्रविष्टः पुनः पुनश्चोत्तमसान्त्ववादी । सुस्वागतां वाचमुदीरयानः पुनः पुनश्चोदयतीव हृष्टः ॥५१॥ इति सप्तविंशः सर्गः॥ वृक्ष की डाली पर बैठा हुआ यह पिङ्गलका मादा सारस जो प्रसन्न हो बारबार मधुर वाणी से बोल रही है से मानों श्रीरामचन्द्र जी के आगमन की सूचना दे रही है ॥ ५१॥ सुन्दरकाण्ड का सत्ताइसौं सर्ग पूरा सुन्दरकाण्ड सर्ग 1 श्लोक 1-40,सुन्दरकाण्ड सर्ग 1 श्लोक 44-77,प्रथम सर्ग 78 से 117,Sarg shlok 139 se 161 in hindi,sunderkanda valmiki ramayana in hindihanuman ji ne kiya lanka dahanSunderkanda sanskrit to hindi PathaSarg 12 valmiki ramayanSunderkanda Sarg 26श्लोक १६२ से २१०,सोने की लंका का वर्णन,श्लोक ४६ से ५७,अलकापूरी की तरह लङ्कापुरी,sarg 4, shlok 1-30,सीता की खोज मै निकले,पुष्पक विमान का वर्णन -1,पुष्पक विमान की चाल कितनी थी?भरत निवास नंदीग्राम,स्वागत और राज्याभिषेक,आदर्श रामराज्य,अगस्त्य ऋषि का अयोध्या आगमनअश्वमेध यज्ञ - के फल और सम्पूर्ण विधि विधानसोलह जनपदों के देशों मै अश्वमेघ यज्ञकथा कौन थे राजा सुमद?राम राज्य अयोध्या का वर्णनvishvamitra aur raja trishnku,विश्वामित्र और त्रिशंकुअयोध्या का गुणों से सम्पन्न सनातन माहात्म्य अर्थहनुमान जी लंका में प्रवेशमहर्षि च्यवन संक्षिप्त जीवन परिचयsakat vrat kathaऋषि च्यवन बिल्कुल स्वस्थ हो गएTilak Lagane ka Rahashya kya hai?satyanarayan vrat kathaNilgiri Parvat Ka Pauranik ItihasSrishti Rachna Ki UtpattAgustaya Rishi Jivan ParichayManu Aur Shatrupa ke Vansh Prampraprajapati daksha full storyहिरण्यक शिपु वंश प्रम्परा का वर्णन4 vedo 18 Purano sahit 14 Vidhyavo Ka Vibhajan16 हिन्दू संस्कार की सम्पूर्ण शास्त्रीय विधिविज्ञान परिचयभारतीय इतिहास की प्राचीन वंशावलीश्री कल्किपुराण अध्याय १५ अशून्यशयन व्रत पूजा विधिTags:सुन्दरकाण्डYou might likeValmiki Ramayan Sunderkand Sarg 27 sanskritt hindi Anuvaad valmiki ramayana online

**🙏 ओम श्री सूर्य देवाय नमः जी 🙏**कभी आपको लगे कि**मैं अकेला क्या कर सकता हूँ* *तो एक नज़र सूरज* *को देख लेना वो अकेला* *ही सारे संसार को* *आलोकित करता है ।**दु:ख और परिश्रम.... मानव जीवन के लिये नितांत आवश्यक हैं,**By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब*🌹🙏🙏🌹*स्मरण रहे...दु:ख के बिना हृदय निर्मल नहीं होता और परिश्रम के बिना मनुष्य का विकास नहीं होता...!!* 🌷🙏जय सूर्य देव 🙏🌷 *🙏 शुभ प्रभात, शुभ रविवार 🙏**